बहुत कम लोग जानते है किन्नरों के रहस्यमय राजो को जो बहुत ही दर्दनाक है

2916

आज हम आपको किन्नरों के बारे में कुछ ख़ास बाते बताने जा रहे है | जो आपने कभिओ नहीं सुनिओ होंगी सुनी भी होंगी तो शायद पूछने की हिम्मत नहीं की होगी | आपको आसपास कई किन्नर मिल ही जाएंगे। कहीं ट्रेनों पर तो कहीं सड़क पर ही गाते बजाते और मांगते हुए। किन्नरों को कोई नौकरी नहीं देता है इस कारण ये अधिकतर मांग कर ही गुजारा करते है। ऐसी मान्यता है कि किन्नरों की बद्दुआ कभी नहीं लेनी चाहिए वरना वो जरूर सच हो जाती है। किन्नरों में आधे गुण पुरुष के और आधे गुण महिलाओं के होते है जो समाज से इनको अलग करते है।आपके दिमाग में एक बात तो जरूर आती होगी कि आखिर किन्नर पैदा कैसे होते है|

पुराणों में लिखा है किन्नरों के बारे में…

आपको शायद पता नहा हो कि किन्नरों का जननांग जन्म से लेकर मृत्यु परांत एक जैसा ही रहता है। यूं कहें कि इनके जननांग कभी विकसित नहीं होते। किन्नरों के अंदर एक अलग गुण पाए जाते हैं। इनमे पुरुष और स्त्री दोनों के गुण एक साथ पाए जाते हैं। “किन्नर” समुदाय के लिए भोपाल में मनाया जाता है त्योहार इनका रहन-सहन, पहनावा और काम-धंधा भी इन दोनों से भिन्न होता है।

आपको बताते चलें कि आज से नहीं…

आपको बताते चलें कि आज से नहीं सदियों से किन्नरों के जन्म की परंपरा चलती आई है। लेकिन आज तक यह पता नहीं लगाया जा सका है कि आखिरकार किन्नरों का जन्म क्यों होता है। अगर बात करें ज्योतिष शास्त्र और पुराणों की तो किन्नरों के जन्म को लेकर इनके भी कई अलग-अलग दावे हैं। ज्योतिष शास्त्र की मानें तो बच्चे के जन्म के बक्त उनकी कुंडली के अनुसार अगर आठवें घर में शुक्र और शनि विराजमान हो और जिन्हें गुरु और चंद्र नहीं देखता है तो व्यक्ति नपुंसक हो जाता है और उसका जन्म किन्नरों में होता है।

किन्नरों के जन्म लेने का कारण…

कई ग्रहो को इसका कारण बताया गया है। शास्त्र की अगर मानें तो किन्नरों की पैदाइश अपने पूर्व जन्म के गुनाहों के वजह से होता है। पुराणों की बात करें तो किन्नरों के होने की बात पौराणिक कथाओं में भी है। पौराणिक कथाओं को अगर माने तो अर्जुन कि भी गिनती कई महीनों तक हिजड़ो मे की जाती थी। मुगल शासन की बात करें तो उस वक्त भी किन्नरों का राज दरबार लगाया जाता था।

प्रति दर बढ़ रहा है औसत…

अब देश में मौजूद पचास लाख से भी ज्यादा किन्नरों को तीसरे दर्जे में शामिल कर लिया गया है। अपने इस हक के लिए किन्नर बिरादरी वर्षों से लड़ाई लड़ रही थी। 1871 से पहले तक भारत में किन्नरों को ट्रांसजेंडर का अधिकार मिला हुआ था। मगर 1871 में अंग्रेजों ने किन्नरों को क्रिमिनल ट्राइब्स यानी जरायमपेशा जनजाति की श्रेणी में डाल दिया था। बाद में आजाद हिंदुस्तान का जब नया संविधान बना तो 1951 में किन्नरों को क्रिमिनल ट्राइब्स से निकाल दिया गया। मगर उन्हें उनका हक तब भी नहीं मिला था।

आज भी परम्पराओ से जुड़ा है रिश्ता…

किन्नर समुदाय में गुरू शिष्य जैसे प्राचीन परम्परा आज भी यथावत बनी हुई है। किन्नर समुदाय के सदस्य स्वयं को मंगल मुखी कहते है क्योंकि ये सिर्फ मांगलिक कार्यो में ही हिस्सा लेते हैं मातम में नहीं ।

किन्नर समाज कि सबसे बड़ी विशेषता है…

किन्नर समाज कि सबसे बड़ी विशेषता है मरने के बाद यह मातम नहीं मनाते हैं। किन्नर समाज में मान्यता है कि मरने के बाद इस नर्क रूपी जीवन से छुटकारा मिल जाता है। इसीलिए मरने के बाद हम खुशी मानते हैं । ये लोग स्वंय के पैसो से कई दान कार्य भी करवाते है ताकि पुन: उन्हें इस रूप में पैदा ना होना पड़े।देश में हर साल किन्नरों की संख्या में 40-50 हजार की वृद्धि होती है। देशभर के तमाम किन्नरों में से 90 फीसद ऐसे होते हैं जिन्हें बनाया जाता है। समय के साथ किन्नर बिरादरी में वो लोग भी शामिल होते चले गए जो जनाना भाव रखते हैं।